
श्रीपाल और मयणा सुंदरी ने नवपद ओली की आराधना उज्जैन में की थी।
श्रीपाल और मयणा सुंदरी ने जिनेश्वर भगवान के मंदिर आते है। आदिनाथ भगवान के मुख का दर्शन करके अत्यंत आनंद हुआ। भगवान की स्तुति की। मयणा सुंदरी ने भगवान की पूजा करके चैत्यवंदन किया। वो समय भगवान के कंठ में से फूल की माला एवं हाथ में से बीजोरु ( फल ) जिनेश्वर भगवान के प्रभाव से शासन देव ने श्रीपाल को दिया। सभी लोग के सामने दिया। और श्रीपाल ने दोनों वस्तु हर्ष से स्वीकार की।
भगवान की पूजा करके दोनों उपाश्रय में गये। गुरुवंदन किया। महाराज साहेब की देशना सुनी। गुरु महाराज मयणा सुंदरी को पहेचान गये। मयणा सुंदरी ने गुरु महाराज को विनंती की , गुरुदेव आगम का उपयोग करके किसी भी उपाय करके श्रीपाल का कोढ रोग दूर कीजिये। आचार्य श्री मुनिचंद्रसूरीश्वसरजी महाराज ने आगम ग्रंथो में से श्री सिद्धचक्रजी का यंत्र बनाया। और मयणा को बताया। गुरु महाराज ने नवपद ओली की विधि कही।
श्रीपाल और मयणा सुंदरी ने नवपद की ओली शुरू की। और पहले आयंबिल से ही रोग का मूल नाश हुआ। श्रद्धा के साथ सिद्धचक्रजी का जाप करने से बहार की चमड़ी निर्मल हुई। बाद में शरीर की कांति बढ़ने लगी। शरीर सुवर्ण जैसा हो गया। नव में आयंबिल के दिन श्री सिद्धचक्रजी के न्हवण जल शरीर पर लगाने से शरीर निरोगी हो गया। सभी लोग सिद्धचक्रजी के गुणगान गाने लगे।
शाश्वत नवपद ओली जी