बेलगाम (कर्नाटक ) में स्वर्णिम अवसर का शंखनाद हुआ, जीवन की सुख शांति और आंतरिक समृद्धि के लिये ज्ञान और सरस्वती के मंत्र जाप आवश्यक है

*कलम,कला और साहित्य का सन्मान*
           *याने सरस्वती का सत्कार*
                   *देवेंद्रसागरसूरिजी*

31-10-2017

बेलगाम  (कर्नाटक ) में स्वर्णिम अवसर का शंखनाद हुआ, जीवन की सुख शांति और आंतरिक समृद्धि के लिये ज्ञान और सरस्वती के मंत्र जाप आवश्यक है जो किसी से नही मिल सकता वह ज्ञान और सरस्वती की साधना से मिल सकता है, धन दौलत भले ही लक्ष्मी जी की कृपा से आती हो पर स्थिरता सरस्वती की कृपा से होती है।

इसलिये 31 अक्टूबर से 2 नवंबर तक तीन दिन बेलगाम मे आचार्य देवेंद्रसागरसूरिजी की निश्रा में त्रिदिवसीय सरस्वती साधना और जाप का भव्य आयोजन  प्रारंभ हुआ। कलम,कला और साहित्य का सन्मान याने सरस्वती का सत्कार। ऐसी मा का जाप अनुष्ठान करे।

सरस्वती माता की कृपा से कोई भी वंचित ना रहे इसलिये जाप 5  समय मे रखा गया है ।पूजन मे सभी को सफेद वस्त्र मे ही पधारना है ।

गुरूदेव ने कहा की वक़्त का काम तो गुज़रना है बुरा हो तो सब्र करो अच्छा हो तो शुक्र करो। और सरस्वती की जाप साधना से प्राप्त विद्या से आप बुरे वक्त से उबर सकते हो । हर व्यक्ति को मरने तक सिखना चाहिए ।बंद घडी भी दिन में दो बार सही समय दिखाती है ।

जगतजननी, भगवती, वाग्देवी सरस्वती की उपासना सृष्टि के उषाःकाल से होती आ रही  है। सरस्वती की उपासना से  विद्वत्ता, सुबुध्दिमत्ता, बृहस्पतित्व, नम्रता एवं वक्तृत्व शक्ति को सरलता से प्राप्त किया जाता है । अज्ञानता और पापों को दूर करनेवाली, अमृत का एकमात्र स्वाद देनेवाली जाप की महिमा है ।स्मरण, जाप के प्रभाव से बोल, वचन सरस ढंग से संजोये गये उच्चारित होते है ।

सम्यगज्ञान याने सच्चे ज्ञान की साधना।सम्यगज्ञान की आराधना के बिना कही भी वास्तविक सफलता है ही नही। सर्व शक्ति, संपत्ति, समृद्धि का मूल ज्ञान ही है । ज्ञान की अधिष्ठात्री के रूप में जैनों की परिभाषा में श्रृतदेवता के  रूप में स्वीकार किया गया है ।

अरिहंत भगवंत के मुख में वास करने वाली सरस्वती देवी ज्ञान-विज्ञान और परमोच्च लक्ष्य तक का मार्ग बतानेवाली है।सरस्वती की पूजा, प्रार्थना, मंत्र, जाप करने से अज्ञान की अज्ञानता दूर होती है ज्ञानावर्णिय कर्म का क्षय और दुर्बुध्दि का विनाश होता है ।

पर सवाल ये है कि देवता के प्रसाद से ज्ञानावर्णिय कर्मों का क्षयोपशम कैसे हो सकता है?
ब्राम्ही आदि औषधि द्रव्यों के सेवन से रोगों का  क्षयोपशम होता है वैसे ही श्रृतदेवता के प्रसाद, कृपा से ज्ञानावर्णिय कर्मों का क्षयोपशम होता है ।

सरस्वती देवी श्री सूरिमंत्र की पांचो पीठो में पहली पीठ की अधिष्ठायिका देवी होने के कारण मा भगवती की उपासना उपास्य है। आर्य परंपरा में कोई भी दिव्यशक्ती को देवता कहने की परंपरा है । *"दिव्यति इति देवता"* जो चमके वह देवता।

परमात्मा ने प्रवचन द्वारा प्रवाहित किया हुआ देदिप्यमान अनंत ऊर्जा प्रवाह वही सारस्वत मह या श्रृतदेवता है । परमात्मा के मुख से प्रगटी हुई अक्षर के बीजयुक्त परावाणी या भाषासमुह के देदिप्यमान पुंज का अक्षयस्तोत्र ही श्रृतदेवता है। परमात्मा के निर्वाण के बाद भी ज्ञान का निर्वाण नही होता।

आज के जाप के प्रथम सत्र मे लाभार्थी *संघवी हंजारीमलजी रिखबचंदजी* बेलगाम परिवार राजस्थान मे तखतगढ ने पुरा लाभ लिया। लाभार्थी परिवार के साथ बहोत से आराधकों ने जाप किया। सरस्वती जाप का लाभ सबको हो इसलिए दोपहर के जाप मे बालिका आदर्श विद्यालय, जी.जी. चिटनीस स्कूल ,व्ही.एन. शानभाग मराठी स्कूल की शिक्षिकाओंने जाप किया।


'/>